गली बरसात और लोहे का जूता !

मेरे घर में , लोहे की खिड़की है ,एक जूता है ,और जिस्म के कुछ पुर्जें हैं ! 

मेरा घर गली के एक छोड़ तक देखता है ,जब बरसात होती है ।


तब वही पुर्जे मुझे जूते पहनता है ,मैं उसको पहनकर खिड़कियों से बाहर गली में बरसात देखता हूँ।


 गली तंग है तो सबको देखता हूँ !
कुछ चप्पलों में भागते हैं ,कुछ छातों के अंदर भीगते हैं और भागते हैं ।

तो कुछ, बरसात के पानी में ,अपने पैरों की अँगुलियोंके दाद को छिपाकर दौड़ कर भाग जाते हैं ।

 

सुना है कि बाद में बरसात का पानी करंट सा लगता है ! 

लेकिन लोहे के जूते में कसने के लिए मर हुई खाल लगी है ।इसलिए उसने करंट नहीं दौड़ सकता !

 इसलिए गली बरसात और मैं थकने तक इंतजार करते हैं ।

बरसात रुकने के बाद पता चला दाद वाले, किसान के लड़के थे । जो बरसाती पानी के करंट से नई चमड़ी उगा रहे थे !

क्योंकि उनकी चमड़ी जिंदा होती है ! 

इसलिए लोहे के जूते में नहीं लगती !

 मेरे लोहे के जूते आखरी बरसात तक ……

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