यादें :जो अकेली हैं

कभी जो मेरा कुछ जला था, 

                उसकी स्याह निशान दिल में है ।

पर जो दिल का जला उनके ना खाक बने ना निशान ;
ओठों के रास्ते जब दिल से निकलने कि कोशिश में ,

मुझे ही घेरे जाती हो एक धुन्ध सी अकेले !
अकेले टेबल पर गहराते हुए एकरूप ,

एकांत हाथों को पकड़े खामोशी से साथ बैठ जाती हो ।
मेरे लफ्ज़ हमेशा की तरह मतलबी ‘दो गहराइयों’ से उलझे हैं, हाँ ! पता है मेरी ब्लैक कॉफी ठंडी हो गई है ,

और तुम्हारे स्नीकर मे आवाज नहीं होती ……

   

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