अधोबिंदु/adhobindu

कुरूप वक्राकृति पत्थर ,सौंदर्य विहीन भंगुर आकृति,

आकृति जो किसी स्वप्न की दास न बन सके । 
ठोकरों से ठिठककर दूर टकराई थी ,उस कलाकार के हृदय जहां आकृतियां ,देह और जीवन के निर्माण की क्षमता थी ।

उसने प्रथम स्पर्श से तुझ में आकार और रंग देखा था !
उसके ‘औजार ‘जो जीवन रहित थे उसने ‘ठूंठ ‘देखा था तुझमें !किंतु उसने ‘संदेह’ ‘देह’ और ‘वासना’ से तुममे अंगों को भरा था ।

तुम निर्जन वन का सौंदर्य हो सकती थी ,किंतु तुम तो केवल ‘मूल्य’ बनी केवल ‘अर्थ’ की छाया !

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