कब तक? 

रातें सर्द हैं घनी हैं 

बदन को जकड़  रहीं,

देखता हूँ ढूंढता हूँ

कुछ नरम सा गर्म सा 

कुछ हम उम्र कुछ बूढ़ी हथेलियां !

लिहाफ कब तक ? 

गहराते धुंध मुझे दबोचे निचोड़ रही हैं   

कमर- एड़ियां जकड़ती दर्द अब जर्द हो रहीं 

एकांत कराह कब तक तक ?

 हथेली मसलते हुए बर्फीले हमसफरी को झटक दिया

 बचे हुए गर्म सांसों को भीतर जप्त कर ,

अचानक किसी ठंडी हथेली ने नब्ज टटोल कसकर जकड़ लिया है ! सहर तक शायद ही छोड़ दें अपनी जकड़ से ।
अपने सेल फोन से बचते गानों के बोल समझ नहीं आ रहे, बस उसकी आवाज को बढ़ा बढ़ा कर अनसुना कर रहा मैं !जकड़े हुए नब्ज में ऊष्मा भी अब ठंडी हो रही 

‘ व्हिस्की ‘ की ‘बेफिक्र’ घूंट अब अनंत सर्द रात्रि की फिक्र में मुझे सुलानेे व्यूह बना रहीं हैं

गर्म उदास बोझिल स्वप्न कब तक ?

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