मां

किताब के खांचो मे रोज ही कुछ फंसाकर,
मैं जब भी उंघते हुए सो जाता हूँ !

तुम अनथक , उस खोह मे मेरा कुछ समेटे हुए
या फिर ,चुपचाप उस अथाह आसमानी तारों वाले सागर में ,
भोर होने तक अकेले मुझे ताकती रहती हो ।

कभी कभार जब कुहरा जादा होता है
तो मैं किताब मे नये खांचे नहीं लगाता, सो जाता हूँ ।
उन दिनों के साथ जो तुमने मेरे लिए अबतक जस का तस रखा है ।

पता है मुझे ! मैं इस धुंध मे तुम्हारे नजर से छिपने के लिए घुसकर बैठा हूँ ,
घने घुप्प अंधेरे मे तुम्हारे बिना कोई रास्ता सही दिशा में नहीं जाता ।

लेकिन मैंने इस दुनिया में तुम्हारे अलावा किसी ऐसे को नहीं देखा ।

निरंतर पंखा झल्लाते पसीने से तर
हवा के एक कतरे को अपनी तरफ मोड़ नहीं पाईं ।

तुम थके हुए हो ,मुझे ओझल हो जाने दो !

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